जब मुझको गुस्सा आता है

— ०९ मई, २००३

जब मुझको गुस्सा आता है
कोई फूल कुम्हला जाता है।
क्या सुबह की ओस पड़ी थी?
वह तो आँसुओं की झड़ी थी।

चलते जब शब्दों के बाण
निकलते तब उन के प्राण
कोई मन ही मन करहाता है
जब मुझको गुस्सा आता है।

रिश्ते की डोर थी क्या इतनी कच्ची?
गुड्डा-गुड्डी का ब्याह, खेली क्या बच्ची?
वो न जीती, मैं कैसे हारा?
खोजूँ कौन काँधे का सहारा?

जब मुझको गुस्सा आता है
उनको भी गुस्सा आता है।
जब आता ही आता है
तब जाता क्या है?

– उनके माथे से मेरे लहू का रंग।

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