दूरियाँ

— २० नवम्बर २००१

न ही कोई पत्र आया
न ही कोई दूरभाष।
दिन गुज़र जाएँगे फिर भी
बैठेंगे हम लगाए आश।

क्या आलस ने है घेरा?
या हो फिर हमसे नाराज़।
तरस तरस गए हम
सुनने को तुम्हारी आवाज़।

दूरियाँ हमने दिन में नापी
थकी न सोए रात।
प्रिय कब तक जागूँ
अब तो कर लो बात।

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