मृत्यु और संगीत

आज शाम ही, गाँव से शिमला पहुंचा। नहा ही रहा था कि घर के दोनों फ़ोन बारी बारी से बजने लगे। और साथ में मेरा मोबाइल भी। नहा कर बाहर निकला तो देखा, अलग अलग लोगों कि मिस काल्स थी।

वापिस फ़ोन घुमाया तो मालूम हुआ कि मेरी बड़ी नानी अपनी अंतिम साँसे गिन रही हैं। रात होते  होते खबर आई कि वे चल बसीं हैं। अब कल सुबह दोबारा गाँव जाऊंगा। वे नानाजी कि प्रथम पत्नी थीं। उनके अपने कोई संतान न होने के कारण नानाजी ने दूसरा विवाह किया था। मेरी माता व मातुल सभी छोटी नानी की संतान हैं। परन्तु उन्हें पाला पोसा बड़ी नानी ने ही था।  दोनों सौतनों में इतना अगाड़ प्रेम शायद ही किसी सौतनों में देखने को मिले। दोनों एक दूसरे के बिना शायद ही कभी रही हूँ। वे बहनें तो न थी पर प्रेम बहनों से बड़कर। कारण शायद यह भी हो सकता है कि १२ – १३ वर्ष कि आयु में वे ब्याह कर इस घर में आ गयी थी, और शुरू से ही बहनों कि तरह रह रही थीं। 

हृदय को सुकून है कि मैं उन से परसों मिला था। और काफी देर तक बातें की। उन्हें अन्य कुछ हितैशियों की तरह मेरे विवाह की चिंता थी।

खैर… मुझे करीब ८ वर्ष पूर्व का दृश्य स्मरण हो रहा है, जब मेरी दादी कि मृत्यु हुयी थी। कल वही दृश्य मेरे ननिहाल में दोहराया जायेगा। ८ वर्ष पूर्व मैंने जाना कि पहाड़ों में संगीत मृत्यु में भी रचा बसा है।

गाँव के किसी व्यक्ति को जिम्मेवारी सौंप दी जाती है कि दिवंगत व्यक्ति के परिजनों को फ़ोन या तार  द्वारा व्यक्ति के सिधारने की खबर पहुंचाई जाये। तत्पश्चात गाँव के गाँव उस गाँव चल देते हैं जहाँ का स्वर्ग सिधारने वाला व्यक्ति हो। जहां पर हमरे पहाड़ी वस्त्र कला लुप्त होती जा रही है, वह आज भी मृत्य में जीवंत हैं। यह पहाड़ी वस्त्र कला आज शादी विवाह वगैरा में भी शायद ही देखने को मिलें।

जहाँ पुरुष अपनी हिमाचली टोपियाँ अलमारियों से नकाल देंगे, वहीँ स्त्रियाँ भी डाठू, चपकन एवं गाची में मिलेंगी। व्यक्ती का पार्थिव शरीर आँगन में रख दिया जाता है। मेरी दादी, किसी गाँव कि अगर बुआ (बूबी) लगती थी तो किसी गाँव की मौसी। तो किसी की भान्जी तो किसी की पुत्री (दादी के मायके वाले)। अब ये सभी लोग टोली बना कर आये हैं। पुरुष और स्त्रियों की अलग टोलियाँ हैं।

ये टोलियाँ शोक प्रकट करने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार कर रही हैं। हो सकता है की इन टोलियों में कोई व्यक्ती आपस में हंसी ठट्ठा भी कर रहे हों, परंतु अपनी बारी आते ही, शोकाकुल हो जाते हैं या शोकाकुल होने का प्रयत्न करते हैं।

इन चार-पांच पुरुषों की मेरी दादी बुआ लगती थी। अब वे मृत्यु शय्या के पास जा कर, अपने मस्तक पर हाथ रखते हुए या आँसू बहाने की चेष्टा करते हुए चिल्ला रहे हैं, “बूबिये बापे, केहे डे तू, मुको नाहीं दिशदे।” यानी कि बुआ और बाप में कोई फरक नहीं होता, मेरी बाप सामान बुआ, तुम कहाँ चली गयी हो, मुझे तुम दिखाई नहीं दे रही हो। वे करीब २ मिनट तक इसी तरह अपना शोक प्रकट करते हैं। ये सब गा कर बोला गया है। इसमें भी संगीत छुपा है।

अब दूसरी टोली की बारी है। पहली टोली शय्या के सामने से उठ कर अपने स्थान पर बैठ गई। दूसरी टोली आगे आ कर आवाज़ लगाती है, “माये, मौसिये ।।।” इस टोली की वे मौसी लगती थीं, वे मौसे को माँ का दर्जा देते हुए, उनके पृथ्वी त्यागने का शोक प्रकट करती हैं।

मैं पहले भी कई बार, कई व्यक्तियों कि अंतिम यात्रा में गया था, परन्तु वे सब शहर में थे। गाँव में किसी अंतिम यात्रा में जाने का पहला अवसर था, वह भी मेरी दादी का, अतः ये सभी रस्म रिवाज़ पहली बार देख पाया।

इसके बाद जब यह निश्चित कर दिया जाता है कि अब कोई टोली नहीं आने वाली और सभी निकट सम्बन्धी मौजूद हैं, शय्या को मरघट की ओर ले जाने के लिए उठाया जाता है। उस समय सभी लोग पुनः अपने अपने रिश्तों की दुहाई देते हुए आलाप करते हैं।

यह रात काफी कठिन है। मुझे नींद आना निश्चित नहीं है। अतः पुरानी स्मृतियों के वर्क खोल रहा हूँ। और यही दृश्य कल सुबह से ही देखने को मिल जायेगा। मम्मी-पापा जो दिल्ली से रात को शिमला के लिए चल पड़े हैं, उनके इंतज़ार में ये रात काटने के लिए ये सब लिख रहा हूँ।

मुझे याद है, कि गाँव में एक बूढी माता जी रहती थीं। उनहोंने मेरे समक्ष एक बार मेरी दादी से प्रार्थना की थी, कि उनके “मरने” पर वे सभी महिलायें जोर जोर से शोक आलाप करें। उन माताजी की मृत्यु के समय तो मैं गाँव में न था, और मुझे ज्ञात नहीं कि मेरी दादी ने अपने वचन को निभाया या नहीं, परन्तु मेरी दादी की मृत्यु के समय जो दृश्य था, उस से लगा, की अवश्य ही दादी ने अपना वचन निभाया होगा।

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