Archive for अक्तुबर, 2007



सब मिथ्या है

Published on अक्तुबर 31, 2007

सब मिथ्या है । सोच रहा हूँ कि निकल पड़ूँ हिमालय की ओर । माँ बाप बीवी भाई बहन सब एक छलावा है । अब समय आ गया है कि मुझे अपना रास्ता स्वयं ढ़ूढ़ना पड़ेगा । आज तक वही किया जो माँ बाप या बीवी ने कहा । अब नहीं ।


स्वप्न

Published on अक्तुबर 30, 2007

मैं इन ढाई महीनों को अगर पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो पाता हूँ की तुम्हे छोड़ने से ज्यादा कारण हैं की हम इस सम्बन्ध की एक नए सीरे से शुरुआत करें।
कारण यही नहीं की मैंने तुम्हारे साथ एक अच्छा वक्त गुज़ारा है, या मेरे हृदय में तुम्हारे लिए अभी भी प्यार है। परन्तु यह [...]


नया सम्बन्ध

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चाह हो रही है कि तुमसे बात करूँ, परन्तु कैसे करूँ? वैसे आश्चर्य नहीं हुआ कि तुम अब भी झूठ बोल रही हो। मैंने जैसा सोचा था कि झूठ बोलना आज तुम्हारी मजबूरी बन चुकी है। मैं तुम्हारे साथ एक नया जीवन शुरू करने के लिए तैयार हूँ, परन्तु पहले जैसी बात न होगी इस [...]


क्षमा

Published on अक्तुबर 27, 2007

इस रिश्ते के कितने मायने हैं, शायद तुम्हे भी एहसास न होगा। शायद मुझे भी एहसास न था। यह मैंने इन पिछले दो महीनों में जाना।
गोलू जो मेरी सबसे प्यारी है, फूट फूट कर रोने लगी जब उसे पता चला कि तुम अब मेरे साथ नहीं रह रही हो। कहने लगी: अब भइया का क्या [...]


क्यों कड़वी की तुमने स्मृतियां

Published on अक्तुबर 17, 2007

क्यों कड़वी की तुमने सब वो स्मृतियां जो हमारे अच्छे समय की थीं। मैं गाँव से वापिस आ रहा था। पापा ने जिद्द की कि हम खाना छैला से ऊपर खाएं। पर मेरा मन नहीं था। मैं कुछ न कह सका। पर मैं खाना नहीं खा पाया। मुझे सब याद आ रहा था जब तुम्हारा [...]


जाओ असत्य का जीवन जियो

Published on अक्तुबर 12, 2007

क्यों हुआ, कैसे हुआ, इन सब बातों में कुछ नहीं रखा है। विश्वासघात, विश्वासघात है। जो कि क्षमा योग्य नहीं है। क्या रखा है इन बातों में जब कि तुम सात फेरों कि मर्यादा लांघ चुकी हो।
क्या रस्में केवल रस्में थी या उनके कुछ मायने भी थे? मैंने कस्मे खाई थी, क्या तुमने नहीं खाई [...]


झूठ के चीथड़े

Published on अक्तुबर 4, 2007

पश्चाताप का एक आँसू न बहा
माफ़ करो – न एक बार कहा।।


पराई बू

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तुम आई थी घर जब पहली बार
छुआ था दीवारों को सहलाकर।
“ये मेरा घर – हमारा घर होगा”
कहा था तुमने थर्राकर।।


विश्वासघात को सलाम

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तेरे विश्वासघात को सलाम
जो कर पाया मैं फ़िर कविता शुरू।।


Unabashed

Published on अक्तुबर 3, 2007

I’m amazed how people can be shameless, particularly, people whom you trusted and thought were committed to you for the life time. They one fine day cheat you and just are unrepentant and shameless. There’s isn’t even an iota of expression of shame on their faces.