तुम आई थी घर जब पहली बार
छुआ था दीवारों को सहलाकर।
“ये मेरा घर – हमारा घर होगा”
कहा था तुमने थर्राकर।।
आज उन दीवारो में पराई बू है
एक परछाई पराई उन पर छाई है।
इस सन्नाटे में दो आवाजें चोर हैं
इन दीवारों में भी न आज कोई गहराई है।।
चाहा तुमने – लिखे तुम पर कोई कविता
जो तुम्हे सुनाया – उसने – सब चुराई है।
मेरे शब्द तो हृदय से निकले
परन्तु, आज यह कविता भी पराई है।।
– २७ अगस्त, २००७ (१०१७ घंटे)