जाओ असत्य का जीवन जियो

शुक्रवार, अक्तूबर 12, 2007 5:26 अपराह्न को विश्वासघात श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

क्यों हुआ, कैसे हुआ, इन सब बातों में कुछ नहीं रखा है। विश्वासघात, विश्वासघात है। जो कि क्षमा योग्य नहीं है। क्या रखा है इन बातों में जब कि तुम सात फेरों कि मर्यादा लांघ चुकी हो।

क्या रस्में केवल रस्में थी या उनके कुछ मायने भी थे? मैंने कस्मे खाई थी, क्या तुमने नहीं खाई थी? शायद तुम्हारे लिए वह सब एक अच्छा लहंगा, सुंदर वस्त्र, आभूषण पह्नेने का अवसर था और एक चलचित्र बनाने का अवसर था जिसे देख देख कर तुम जिन्दगी भर रोती रहो और मुझे बताती रहो कि तुम अपने पिता के गले कि झुर्रियां देख सकती हो। उन कि नम आंखों में तुम्हे अक युग खोता हुआ नज़र आता है।

और आज उसी बाप को तुमने शर्मिंदा किया है। ५ सितंबर, २००७ को जब तुम घर आई थी अपने माँ, बाप, भाई के साथ, मुझे दया आ रही थी तुम्हारे बाप पर। वो झुकी आँखें, झुकी गर्दन। तुमने उन्हें शर्मिंदा कर दिया। एक शब्द नहीं बोल पाए वो। पर मुझे आश्चर्य था कि तुम्हारी आंखों में ज़रा भी लज्जा, खेद, दुःख नहीं था। शायद मैं ग़लत था कि तुमसे यह अपेक्षा कर रहा था, क्यूंकि अगर तुम्हे लज्जा होती तो शायद तुम पहले ही ऐसा कार्य नहीं करती।

तुम्हारी सज़ा यही है कि – जाओ और उम्र भर असत्य का जीवन जीयो। आज से तुम्हारा हर सम्बन्ध असत्य पर स्थापित होगा – चाहे वह कोई भी सम्बन्ध हो। जाओ असत्य का जीवन जियो और अपनी इस असत्य की अग्नि में जलती रहो।



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