क्यों कड़वी की तुमने स्मृतियां

बुधवार, अक्तूबर 17, 2007 4:05 अपराह्न को विश्वासघात श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

क्यों कड़वी की तुमने सब वो स्मृतियां जो हमारे अच्छे समय की थीं। मैं गाँव से वापिस आ रहा था। पापा ने जिद्द की कि हम खाना छैला से ऊपर खाएं। पर मेरा मन नहीं था। मैं कुछ न कह सका। पर मैं खाना नहीं खा पाया। मुझे सब याद आ रहा था जब तुम्हारा वहाँ पर बहनों ने मिलकर श्रृंगार किया था। हमारी सब अच्छी यादों पे तुमने पानी फेर दिया।

गाँव में तुम किलटे के साथ खड़ी थी। मुझे याद आते हैं क्षण जब रात को बीच सड़क में गाड़ी रोक कर चांदनी में नहाते हुए हमने आलिंगन किया था। मुझे याद आते हैं क्षण जब हम शिमला से वापिस आ रहे थे और सोलन के पास तुम पहाड़ पे चढ़ कर बाहें फैलाए खडी थी। फिर सुरंग के बाहर खडी थी। मैं घर आता था और तुम मेरा इंतज़ार करती थी और बाँहों में लेने की जिद्द करती थी। मैं थका होता था और मन नहीं करता था परन्तु तुम्हारी बाँहों में आकर पिघलने लगता था। आज वह सब झूठ लगता है। उस आलिंगन में एक पराई बू आ रही है। मुझे अपने आप से घिन्न हो रही है। पर तुम अपने घमंड में इतनी चूर हो कि तुम्हे कुछ याद नहीं।

सोचा था, अभी मेहनत कर लूँ, जिन्दगी में कुछ बन पाया तो कहूँगा – कि इसमें मेरी पत्नी का हाथ है। परन्तु तुम इंतज़ार न कर सकी।

उन यादों का क्या करूं? कौन से कोने में जा कर उनको दबा दूँ जिनपे तुमने एक कालिख पोथ ली है?



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