चाह हो रही है कि तुमसे बात करूँ, परन्तु कैसे करूँ? वैसे आश्चर्य नहीं हुआ कि तुम अब भी झूठ बोल रही हो। मैंने जैसा सोचा था कि झूठ बोलना आज तुम्हारी मजबूरी बन चुकी है। मैं तुम्हारे साथ एक नया जीवन शुरू करने के लिए तैयार हूँ, परन्तु पहले जैसी बात न होगी इस रिश्ते में। पर कोशिश की जा सकती है। परन्तु तुम्हे भी किसी मोड़ पर आ कर सच बोलना होगा। मेरा यह मानना है कि किसी भी रिश्ते की शुरूआत सच की नींव पर होनी चाहिए। तुम मानो या न मानो हम दोनों को ही शून्य से शुरूआत करनी पड़ेगी। और इसके लिए सच की नींव रखनी पड़ेगी।
परन्तु इस नई शुरूआत में भी बहुत काँटें हैं। मेरे माता पिता जो तुम्हे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। उनको कैसे समझाऊँ? मुझसे अधिक उनके विश्वास का हनन हुआ है। आज सब तुम पर निर्भर करता है, तुम किस तरह से उनको समझाने की व उनका विश्वास जीतने की पहल करती हो।
मेरी दुर्गा माँ से यही प्रार्थना है कि वो तुम्हे सत्य बोलने की शक्ति दे और मुझे और मेरे माता पिता को तुम्हे क्षमा करने की शक्ति दे।