सब मिथ्या है

बुधवार, अक्तूबर 31, 2007 11:04 पूर्वाह्न को जीवन श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

सब मिथ्या है । सोच रहा हूँ कि निकल पड़ूँ हिमालय की ओर । माँ बाप बीवी भाई बहन सब एक छलावा है । अब समय आ गया है कि मुझे अपना रास्ता स्वयं ढ़ूढ़ना पड़ेगा । आज तक वही किया जो माँ बाप या बीवी ने कहा । अब नहीं ।

माँ मुझे अपने पास बुला लो, अब मैं तुम्हारे चरणोँ में जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ । जिसने चाहा अपनी मरजी की है । माँ बाप को जो अच्छा लगा उन्होंने किया . बीवी को जो अच्छा लगा उसने किया । मैं सिर्फ फर्ज़ का बोझ ढ़ौता रहा । कभी माँ बाप का तो कभी बीवी का । अब समय आ गया है कि अपने मन की करूँ । माँ बस अब बुला लो । इस झूठे जीवन में अब कुछ नहीं रखा है ।

जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ कि जीवण एक बहुत बड़ा समय व्यतीत है । अगर समय ही व्यतीत करना है तो क्यों न कहीं धूनी रमाई जाए ।



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