चले थे जहाँ से, पर्वत छूना था।
डगर एक थी मगर क्यों फिर भटक गए?
क्यों हमसफर बदल गए, जो हम तुम
अस्तित्व की खोज में चट्टान पे लटक गए।
जो तमाश बीन थे सात फेरों में साथ
हो हल्ला करके सोते हैं घरों में अपने।
बहरे सुने न कोई चीख पुकार
फिसलते हाथों से जब सिसकते सपने।।
एक टहनी जो चट्टान से फूटी है
आओ उभरें अब तो साथ साथ।
आदर्श इस टहनी को बनाकर
पकड़े रखना होगा एक दूजे का हाथ।।