मैं भूल गया था कि आज हमारी विवाह की दूसरी वर्षगाँठ है। जीजू का फोन आया बधाई देने के लिए। कुछ लोग जले पर नमक छिड़कने से बाज़ नहीं आएँगे।
कैसी विडम्बना है कि हम एक दूसरे को बधाई नहीं दे सकते। कितने दूर हो गए हैं हम?
क्या वह दिन आएगा जब एक दूसरे के सामने किसी झिझक के होंगे? हम ये दिवस बिना किसी शिकायत के मना सकेंगे?
क्यों यह मोड़ आया?
क्या उसे याद होगा यह दिन? मुझे तो याद न था। क्या सोचती होगी वह? अगर उसे याद है तो क्या वह फोन करेगी बधाई देने के लिए? सवाल, सवाल और कई सवाल, जो कि सब क्या से शुरू होते है।
क्या, क्यों, कैसे, कब, कहाँ… इन सवालों के जवाब ढ़ूढ़ने में उम्र बीत जाएगी…
फिर क्या? क्या ये सवाल कभी खत्म होंगे? क्या ये अँधेरा कभी खत्म होगा?