कहाँ नेहा लगा बैठा मन भी?
अर्थनारीश्वर बन बैठी शिव पास।
पर्वतराज की है प्यारी पारो
मैं तो केवल देवदास॥
शक्ति बन, सती बन, असुर रिझाए
तपस्वी तपस्या करती हो भंग।
स्वयंवर में आमन्त्रित करके
हो चली हो भूतनाथ संग॥
देवदास भी नीलकंठ नाम सहाया
नेह का प्याला कंठ भरा।
हिमल गुफा जा छुप बैठी
हमें धकेले पाताल धरा॥