चले जा रहे हैं

मंगलवार, जुलाई 1, 2008 2:40 अपराह्न को कविता श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

–२७ मार्च २००३

न जाने कौन किस आह पर
हाथ थाम बैठे
बस इसी आस में कराह रहे हैं।

कितने मौसम बीत गए
इस लवण में तरते तरते
न जाने किस बरसी बूँद से
मोती बन बैठें
बस इसी प्यास में बहे जा रहे हैं।

 

कितने भंवरे चूम गए
पंखुड़ियॉं सहलाते
न जाने किस पराग से
बीज बन ऐंठें
बस इसी लाज में खिले जा रहे हैं।

 

कितनी मंज़िलें मापी
कितने महल ध्वस्त हुए
बस गिने जा रहे हैं।
न जाने कौन किस राह पर
साथ चल बैठे
बस इसी तलाश में चले जा रहे हैं
चले जा रहे हैं।

 

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