नई धार

मंगलवार, जुलाई 1, 2008 4:04 अपराह्न को कविता श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

– १७ नवम्बर २००१

समय की धार के इस पार
मैं खड़ा, तुम उस पार।
मैं तरूँ, थोड़ा तुम आ जाओ।
आ बह निकलें इस धार संग।

नहीं।
मैं तरूँ उस ओर या तुम इस छोर
आ बस जाएँ हम किनारे पर।
बह जाने दो इस धार को।

एक दूजे की बाहों में
सिमट कर
पिघल कर
आ बह जाएँ
एक नई धार बनकर
समय से दूर
बहुत दूर
आ बह जाएँ
एक नई धार का स्रोत
बनकर।



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