नरम गरम

मंगलवार, जुलाई 1, 2008 2:54 अपराह्न को कविता श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

– २००१

मुट्ठियाँ भींचकर
थोड़ी सर्दी छुपा लूँ
गर्मी के लिए।

हाथों से सहलाकर
थोड़ी हिम चुरा लूँ
नर्मी के लिए।

इस कोहरे के पार
एक अम्बर है
तारों को सम्भाल।
इस हृदय के पार
तुम्हारा साथ है
विषाद से विशाल।

 

हिम भी तुम हो, ये सर्दी भी।
ये गर्मी भी, ये नर्मी भी तुम हो।
ये अम्बर भी तुम हो, ये तारे भी।
ये हृदय भी, मेरा साथ भी तुम हो।

 

मैं बनकर कोहरा, तेरे हाथों को थाम
उड़ा जाता हूँ, लेते तुम्हारा नाम…

मेरी मुट्ठियों को खोल दो
मेरे हाथों को सहला दो
थोड़ी गर्मी के लिए, थोड़ी नर्मी के लिए॥



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