बच्ची ही तो हो

मंगलवार, जुलाई 1, 2008 3:13 अपराह्न को कविता श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

– १ दिसम्बर २००१, ०१२० घंटे

तेरे बचपन की नादानियॉं
तेरे हाथों से कब छूटे?
बच्ची ही तो हो।
यह समझ लिया, तो कैसे रूठें?

पकड़ लूँ बँह या बाल अंगुली
खेलूँ तुमसे या प्यार करूँ?
बच्ची ही तो हो।
यह समझ लिया, तो कैसे हरूँ?

लाड़ी कहूँ तुमको या लाडली
ओंठ चूम लूँ तुम्हारे या मस्तक?
हम तो डरे, वसन पर तुम्हारे यौवन
देगा कब दस्तक?

बच्ची ही तो हो, या फिर नाटक?
बुढ़ापा छा रहा हम पे, हम डरे।
केश श्वेत हुए हमारे,
तुम्हारी हठ के आगे, क्या करें?

करती हो कोध या अठखेलियॉं?
यही तो हम न समझा करें।
बच्ची ही तो हो।
यह समझ लिया, तो कैसे डरें?

तेरे बचपन की नादानियॉं
तेरे हाथों से कब छूटे?
बच्ची ही तो न हो।
तभी तो दिल, कितनी बार टूटे?
कई बार टूटे।



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