यह एकाँकीपन क्यों? सब साथ में तो है मेरे। कितने रिश्ते हैं? रक्त के रिश्तों से भी परे हैं रिश्ते मेरे। फिर भी क्यों ये मन क्यों किसी की तलाश में भटक रहा है।
मैं आजकल एक विदेशी लेखक द्वारा रचित पुस्तक “अघोरा – कुँडलिनी” पढ़ रहा हूँ। अगर पुस्तक पढ़ने मात्र से मैं स्वयं को पा जाता, तो कितने लोग इस तरह से भटक नहीं रहे होते। किस चीज़ की खोज है, व क्यों जी रहा हौँ मैं? क्या हासिल करना है? कुछ तो है, जिसकी मुझे तलाश है। वरना इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी जिए जा रहा हूँ, और चला जा रहा हूँ, शीश उठाए।
कभी कभी प्रतीत होता है जैसे मधुमक्खी ने गर्दन पे डंक मार दिया हो, और मैं कराह तो रहा हूँ, गर्दन उठाए। शीश उठा है दर्द में, किन्तु मधुमक्खी को यह प्रतीत न होने पाए। उसे प्रतीत होना चाहिए कि अंत में जीत मेरी है। उसके डंक के खो जाने पे और उसकी मृत्यु पे।
चलो, शिश उठाए चलते हैं, किसी राह पर, ना जाने किस की खोज में। अगर आपको कहीं मिल जाए तो कृप्या बता देना।