क्यों ये जीवन इतना उदासीन लगता है? सब नीरस। आज कार्यालय नहीं गया। न जाने जीवन आज क्या दिखाना चाहता है? पिछले वर्ष एक दिवस कार्यालय नहीं गया था तो जीवन कुछ क्षणों में उथल पुथल हो गया था। सम्बन्धों के मायने ही बदल गए। आज भी किसी अनहोनी का एहसास लिए बैठा हूँ। इसी आशंका में की कहीं न कहीं कुछ तो अनहोनी हो रही है।
समय अपनी कौन सी चाल चल रहा है? व अपनी शतरंज के खेल में कौन सा मोहरा आगे करने जा रहा है? यह केवल संयोग नहीं हो सकता कि मैंने कल रात अनुमानन १० मास बाद मदिरा का सेवन किया, व आज घर पे बैठा हूँ। यह भी क्या संयोग मात्र है कि मैने आज “लाइफ इन अ मैट्रो” देखी? सब कुछ उदासीन है। यूँ प्रतीत होता है मानो सभी लोग, इर्द गिर्द, किसी न किसी के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। यों प्रतीत होता है मानो इस फिल्म के सभी पात्र मेरे साथ उपहास कर रहे हैं। जो विश्वासघात मेरे साथ हुआ, उसको पर्दे पर चित्रित कर रहे हैं। परन्तु गाने अच्छे हैं। “क्या है मुझे भी इजाज़त, कर लूँ मैं भी मुहब्बत?” शायद नहीं। मुहब्बत किसके नसीब में है? शायद मेरे नहीं। हिन्दी के शब्दों के प्रयोग से सीधा हिन्दुस्तानी शब्दों का प्रयोग करने लगा हूँ।
इस समय शायद उचित भी है, जब जगजीत सिंह द्वारा गाई गज़ल की कुछ पंक्तिया याद आ रही है… अकेलेपन से खौफ आता है मुझ को, कहाँ हो ऐ मेरे ख़्वाबों ख्यालों?
पूरी गज़ल इस तरह है… और “लियाकत अली आसिम” की लिखी हुई है। शायद इस समय मौके की नज़ाकत को देखते हुए पूरी गज़ल ही मुझ पर फितरे कस रही है…
कहीं ऐसा ना हो दामन जला लो
हमारे आंसुओं पर ख़ाक डालो ।
मनाना ही ज़रूरी है तो फिर तुम
हमें सब से खफा होकर मना लो ।
बहुत रोई हुई लगती हैं आँखें
मेरी खातिर ज़रा काजल लगा लो ।
अकेलेपन से खौफ आता है मुझको
कहाँ हो ऐ मेरे ख़्वाबों ख्यालों ?
बहुत मायूस बैठा हूँ मैं तुम से
कभी आकर मुझे हैरत में डालो ।