मद्यमत्तता व प्रलोभन

बुधवार, जुलाई 16, 2008 4:17 pm को जीवन श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

एक घिन्न सी आ रही है अपने आप से। क्यों मैं जीजू के प्रलोभन में आ गया व मदिरा का सेवन किया। उनका कहना था कि मेरे शरीर में एलकोहोल लैवल गिर गया है, इसलिए मुझे यह दर्द वगैरा हो रहा है, अतः मुझे थोड़ी बीयर का सेवन कर लेना चाहिए। यह प्रलोभन शायद काफी मँहगा पड़ा। घर आने पर, शेखर को तंग किया, व उसको और बीयर लाने को कहा। उससे पहले मैं हेमा व विकास को तंग कर ही रहा था। शेखर के जाने के बाद भी उनको तंग किया। शायद बहुत कुछ बोल गया जो मैं वरना नहीं बोलता। वे सर्वदा ही साथ रहे हैं।

देखा जाए तो ठीक ही हुआ। वरना मैं अपने हृदय की बात न बोल पाता। मैंने हेमा को कहा भी, कि अगर अभी नहीं बोल पाया तो शायद कभी नहीं बोल पाऊँगा। ज़रूरी नहीं कि उनके पास किसी बात का हल हो, और शायद मैंने उनसे कोई बात पहले भी इसलिए नहीं कही कि उनके पास किसी बात का हल हो। परन्तु हृदय की बात कहना शायद अधिक मायने रखता है।

हेमा फिर भी भावुकता में बात करती है, परन्तु विकास की बातें अधिक व्यवहारिक होती हैं। परन्तु इस हृदय का क्या करें जो व्यवहारिकता में नहीं जीना चाहता। हेमा ने कहा तो है वो मुझसे उस विषय में विस्तार में बात करेगी। परन्तु मैं यह भी जानता हूँ कि वह समाय शीघ्र नहीं आने वाला। जिस तरह से मैं समय के जाल में बँधा हूँ, उसी तरह से हेमा व विकास भी अपने अपने दुःख लिए जी रहे हैँ। उनकी अपनी कहानियाँ हैं जो रंगमंच पर रचनी होंगी। मेरी प्रार्थना तो यही है कि उनकी मनोकामना शीघ्र पूरी हो।

वैसे एक बात तो निश्चित है कि मैं अब दोबारा मदिरा को हाथ नहीं लगा सकता। मनुष्य इतना कमज़ोर हो जाता है, यह पहली बार एहसास हुआ। ऐसा नहीं कि पहले कभी मदिरा का सेवन नहीं किया, पर शायद अब बूढ़ा हो चला हूँ। अब इन तिलों में शायद वह तेल न रहा। परन्तु अच्छा ही है, मैं मदिरा के व्यसन को एक नए मायने से देख पाया और उसके कुप्रभाव को परख सका। वह बात ही क्या जिसको बोलने के लिए मुझे किसी मद्यमत्तता का सहारा लेना पड़े। ऊपर से अपनी बेटी की उलाहना सुननी पड़े। मैं अपनी बेटी से इस बात को ले कर नज़रें नहीं मिला सकता, और मेरी प्रार्थना भी यही होगी कि वह मुझसे इस विषय में कोई प्रश्न न करे। क्योंकि मेरे पास शायद कोई शब्द न हों कहने के लिए।



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