Archive for जुलाई, 2008



देख तू लाड़िए

Published on जुलाई 1, 2008

शेखर मास्टा व ढलेटा सुरेन्द्र कुमार
– १९९९
शादिए आशै आमै हेरे भाइयौ,‍‍ देखो लाड़े री ज़ानी रे। देख तू लाड़िए
लाड़ी ताखू भी छोड़िओ, देख लाड़े खी ढौबो हाए तेरे नानी री॥ देख तू लाड़िए
घोड़ी गाशी आशो लॅंगड़ो लाड़ो, देख कौर दो शादीए, मेरीए दादिए।
जिशी बियाली खौरै दपारै खोलो दारू रै आदिए॥


हिमल तुझे पुकार रहे

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पग निष्कासित कर देहलीज़ से
हिमल तुझे पुकार रहे।
क्यों सिसकता चौ भीति भीतर,
उन्मुक्त गगन में फुँफकार रे।


नई धार

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– १७ नवम्बर २००१
समय की धार के इस पार
मैं खड़ा, तुम उस पार।
मैं तरूँ, थोड़ा तुम आ जाओ।
आ बह निकलें इस धार संग।


स्वप्न आते हैं?

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– ९ नवम्बर, २००१
कौन कहता है
स्वप्न आते हैं?

अगर इसे घर कहूँ
तो घर के एक कोने में
अलमारी सदैव बंद रहती।
दिन उसके छिद्रों में
प्रति संध्या विश्राम करता।


जब मुझको गुस्सा आता है

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– ०९ मई, २००३
जब मुझको गुस्सा आता है
कोई फूल कुम्हला जाता है।
क्या सुबह की ओस पड़ी थी?
वह तो आँसुओं की झड़ी थी।


दूरियाँ

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– २० नवम्बर २००१
न ही कोई पत्र आया
न ही कोई दूरभाष।
दिन गुज़र जाएँगे फिर भी
बैठेंगे हम लगाए आश।


निष्ठुर

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– १ दिसम्बर २००१
मैं अकेलेपन की चादर ओढ़
सर्दी में रहा ठिठुर।
तू स्तनों में ताप लिए
दूर खड़ी ललचाए निष्ठुर।


बच्ची ही तो हो

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– १ दिसम्बर २००१, ०१२० घंटे
तेरे बचपन की नादानियॉं
तेरे हाथों से कब छूटे?
बच्ची ही तो हो।
यह समझ लिया, तो कैसे रूठें?


अर्चना – एक वृक्ष

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– ७ – ११ -२००१
प्राक्कथन की याचिका थी
शब्दों का प्रयास।
कब अध्याय बन गए
सम्बन्धों का उपन्यास।


अर्चना

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–१७ नवम्बर २००१
बेचैन कर रही तेरी याद
दिल को चीर कर एक आवाज़।
पुनः पुनः पुकार रही
अर्चना। अर्चना। अर्चना।