स्वप्न आते हैं?
– ९ नवम्बर, २००१ कौन कहता है स्वप्न आते हैं? अगर इसे घर कहूँ तो घर के एक कोने में अलमारी सदैव बंद रहती। दिन उसके छिद्रों में प्रति संध्या विश्राम करता।
– ९ नवम्बर, २००१ कौन कहता है स्वप्न आते हैं? अगर इसे घर कहूँ तो घर के एक कोने में अलमारी सदैव बंद रहती। दिन उसके छिद्रों में प्रति संध्या विश्राम करता।
– ०९ मई, २००३ जब मुझको गुस्सा आता है कोई फूल कुम्हला जाता है। क्या सुबह की ओस पड़ी थी? वह तो आँसुओं की झड़ी थी।
– २० नवम्बर २००१ न ही कोई पत्र आया न ही कोई दूरभाष। दिन गुज़र जाएँगे फिर भी बैठेंगे हम लगाए आश।
– १ दिसम्बर २००१ मैं अकेलेपन की चादर ओढ़ सर्दी में रहा ठिठुर। तू स्तनों में ताप लिए दूर खड़ी ललचाए निष्ठुर।
– १ दिसम्बर २००१, ०१२० घंटे तेरे बचपन की नादानियॉं तेरे हाथों से कब छूटे? बच्ची ही तो हो। यह समझ लिया, तो कैसे रूठें?
– ७ – ११ -२००१ प्राक्कथन की याचिका थी शब्दों का प्रयास। कब अध्याय बन गए सम्बन्धों का उपन्यास।
–१७ नवम्बर २००१ बेचैन कर रही तेरी याद दिल को चीर कर एक आवाज़। पुनः पुनः पुकार रही अर्चना। अर्चना। अर्चना।
मैं भागा-भागा पपीहर पाछे सुनने कहुक मधुर पुकार। वो बैठा – बस बाँह तेरे चूड़ियों में छुप छनकार॥
–२७ मार्च २००३ न जाने कौन किस आह पर हाथ थाम बैठे बस इसी आस में कराह रहे हैं।