क्यूँ मैं हर बार हारा?
समेटा रिश्तों को मुठ्ठी में जो,
फिसलते रेत सम बन धारा।
गिर कर उठना, उठ कर फिर…
क्यूँ गिरता, फिर हारा?
क्यूँ मैं हर बार हारा?
क्यूँ मैं बार बार हारा?
समेटा रिश्तों को मुठ्ठी में जो,
फिसलते रेत सम बन धारा।
गिर कर उठना, उठ कर फिर…
क्यूँ गिरता, फिर हारा?
क्यूँ मैं हर बार हारा?
क्यूँ मैं बार बार हारा?
नितिन ने बचपन की याद दिला दी है, सर्दियों की छुट्टियों की बात करके।
वो लिखते हैं: “सर्दियाँ आख़िर आ ही गयीं। इस समय रात का एक बजा है और कडाके की ठण्ड पड़ रही है। इस ठण्ड में आख़िर नींद कहाँ आने वाली है। सोचा क्यों न कुछ लिखा जाए। सर्दियाँ आते ही मुझे [...]
I’ve been missing from this place for long now. Nityin has just inspired me to write something. He wrote a year-round-up on his blog. Well, here’s mine. It’ll be more of personal, rather than a global round-up.
Where do I start? Well, it’s been more than a year now that I’m on medication for depression and [...]