क्यूँ मैं हर बार हारा?

मंगलवार, जनवरी 6, 2009 12:44 अपराह्न को कविता श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

समेटा रिश्तों को मुठ्ठी में जो,
फिसलते रेत सम बन धारा।
गिर कर उठना, उठ कर फिर…
क्यूँ गिरता, फिर हारा?
क्यूँ मैं हर बार हारा?
क्यूँ मैं बार बार हारा?



एक टिप्पणी to “क्यूँ मैं हर बार हारा?”

  1. NITYIN का कहना है:


    Visit NITYIN

    बंधुवर, आप तो शब्दों के जादूगर हैं. क्या बात कह गए आप. वैसे हैं कहाँ आप आजकल. काफी दिनों से कोई ख़बर नहीं है आपकी.


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