समेटा रिश्तों को मुठ्ठी में जो,
फिसलते रेत सम बन धारा।
गिर कर उठना, उठ कर फिर…
क्यूँ गिरता, फिर हारा?
क्यूँ मैं हर बार हारा?
क्यूँ मैं बार बार हारा?
क्यूँ मैं हर बार हारा?
मंगलवार, जनवरी 6, 2009 12:44 अपराह्न को कविता श्रेणी में प्रकाशित किया गया।
NITYIN का कहना है:
फरवरी 19th, 2009 at 1:14 पूर्वाह्नVisit NITYIN
बंधुवर, आप तो शब्दों के जादूगर हैं. क्या बात कह गए आप. वैसे हैं कहाँ आप आजकल. काफी दिनों से कोई ख़बर नहीं है आपकी.