बलात्कार

शनिवार, फरवरी 28, 2009 11:09 पूर्वाह्न को कविता श्रेणी में प्रकाशित किया गया।

बर्फ की चादर उतार
पर्वत खड़े नग्न इस बार।
इसे उनकी बेहयाई कहूँ
या मनुष्यों द्वारा बलात्कार?

सिकती रोटी सी है धरा
जलने में अभी देर ज़रा।
अंगार फूँक कर स्वयं ही
मानस खड़ा अब डरा डरा।।

नदी स्तनों की काई सूखी
दुग्ध बिन मीन भूखी।
चीर हरण कर स्वयं ही
मगर की भी आँखें रूखी।।



एक टिप्पणी to “बलात्कार”

  1. sujay का कहना है:


    Visit sujay

    good man
    i am sujay from rohru
    aapki is koshish ko dekh kar mogambo kush hua
    aapko twitter pe follow kar raha hun stay in touch


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