Archive for the 'कविता' Category



बलात्कार

Published on फरवरी 28, 2009

बर्फ की चादर उतार
पर्वत खड़े नग्न इस बार।
इसे उनकी बेहयाई कहूँ
या मनुष्यों द्वारा बलात्कार?
सिकती रोटी सी है धरा
जलने में अभी देर ज़रा।
अंगार फूँक कर स्वयं ही
मानस खड़ा अब डरा डरा।।
नदी स्तनों की काई सूखी
दुग्ध बिन मीन भूखी।
चीर हरण कर स्वयं ही
मगर की भी आँखें रूखी।।


क्यूँ मैं हर बार हारा?

Published on जनवरी 6, 2009

समेटा रिश्तों को मुठ्ठी में जो,
फिसलते रेत सम बन धारा।
गिर कर उठना, उठ कर फिर…
क्यूँ गिरता, फिर हारा?
क्यूँ मैं हर बार हारा?
क्यूँ मैं बार बार हारा?


हिमल तुझे पुकार रहे

Published on जुलाई 1, 2008

पग निष्कासित कर देहलीज़ से
हिमल तुझे पुकार रहे।
क्यों सिसकता चौ भीति भीतर,
उन्मुक्त गगन में फुँफकार रे।


नई धार

Published on

– १७ नवम्बर २००१
समय की धार के इस पार
मैं खड़ा, तुम उस पार।
मैं तरूँ, थोड़ा तुम आ जाओ।
आ बह निकलें इस धार संग।


स्वप्न आते हैं?

Published on

– ९ नवम्बर, २००१
कौन कहता है
स्वप्न आते हैं?

अगर इसे घर कहूँ
तो घर के एक कोने में
अलमारी सदैव बंद रहती।
दिन उसके छिद्रों में
प्रति संध्या विश्राम करता।


जब मुझको गुस्सा आता है

Published on

– ०९ मई, २००३
जब मुझको गुस्सा आता है
कोई फूल कुम्हला जाता है।
क्या सुबह की ओस पड़ी थी?
वह तो आँसुओं की झड़ी थी।


दूरियाँ

Published on

– २० नवम्बर २००१
न ही कोई पत्र आया
न ही कोई दूरभाष।
दिन गुज़र जाएँगे फिर भी
बैठेंगे हम लगाए आश।


निष्ठुर

Published on

– १ दिसम्बर २००१
मैं अकेलेपन की चादर ओढ़
सर्दी में रहा ठिठुर।
तू स्तनों में ताप लिए
दूर खड़ी ललचाए निष्ठुर।


बच्ची ही तो हो

Published on

– १ दिसम्बर २००१, ०१२० घंटे
तेरे बचपन की नादानियॉं
तेरे हाथों से कब छूटे?
बच्ची ही तो हो।
यह समझ लिया, तो कैसे रूठें?


अर्चना – एक वृक्ष

Published on

– ७ – ११ -२००१
प्राक्कथन की याचिका थी
शब्दों का प्रयास।
कब अध्याय बन गए
सम्बन्धों का उपन्यास।