Archive for the 'कविता' Category



अर्चना

Published on जुलाई 1, 2008

–१७ नवम्बर २००१
बेचैन कर रही तेरी याद
दिल को चीर कर एक आवाज़।
पुनः पुनः पुकार रही
अर्चना। अर्चना। अर्चना।


तीज

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मैं भागा-भागा पपीहर पाछे
सुनने कहुक मधुर पुकार।
वो बैठा – बस बाँह तेरे
चूड़ियों में छुप छनकार॥


नरम गरम

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– २००१
मुट्ठियाँ भींचकर
थोड़ी सर्दी छुपा लूँ
गर्मी के लिए।


कहाँ नेहा लगा बैठा मन भी?

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कहाँ नेहा लगा बैठा मन भी?
अर्थनारीश्वर बन बैठी शिव पास।
पर्वतराज की है प्यारी पारो
मैं तो केवल देवदास॥


चले जा रहे हैं

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–२७ मार्च २००३
न जाने कौन किस आह पर
हाथ थाम बैठे
बस इसी आस में कराह रहे हैं।


चलें अब तो साथ साथ

Published on नवंबर 1, 2007

चले थे जहाँ से, पर्वत छूना था।
डगर एक थी मगर क्यों फिर भटक गए?
क्यों हमसफर बदल गए, जो हम तुम


झूठ के चीथड़े

Published on अक्तूबर 4, 2007

पश्चाताप का एक आँसू न बहा
माफ़ करो – न एक बार कहा।।


पराई बू

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तुम आई थी घर जब पहली बार
छुआ था दीवारों को सहलाकर।
“ये मेरा घर – हमारा घर होगा”
कहा था तुमने थर्राकर।।


विश्वासघात को सलाम

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तेरे विश्वासघात को सलाम
जो कर पाया मैं फ़िर कविता शुरू।।


आपका क्या है विचार?

Published on सितम्बर 28, 2007

वैतर्णी के पार
है एक संसार।
मैं तो तर गया
है आपका क्या विचार?