अर्चना
–१७ नवम्बर २००१
बेचैन कर रही तेरी याद
दिल को चीर कर एक आवाज़।
पुनः पुनः पुकार रही
अर्चना। अर्चना। अर्चना।
–१७ नवम्बर २००१
बेचैन कर रही तेरी याद
दिल को चीर कर एक आवाज़।
पुनः पुनः पुकार रही
अर्चना। अर्चना। अर्चना।
मैं भागा-भागा पपीहर पाछे
सुनने कहुक मधुर पुकार।
वो बैठा – बस बाँह तेरे
चूड़ियों में छुप छनकार॥
कहाँ नेहा लगा बैठा मन भी?
अर्थनारीश्वर बन बैठी शिव पास।
पर्वतराज की है प्यारी पारो
मैं तो केवल देवदास॥
–२७ मार्च २००३
न जाने कौन किस आह पर
हाथ थाम बैठे
बस इसी आस में कराह रहे हैं।
चले थे जहाँ से, पर्वत छूना था।
डगर एक थी मगर क्यों फिर भटक गए?
क्यों हमसफर बदल गए, जो हम तुम
तुम आई थी घर जब पहली बार
छुआ था दीवारों को सहलाकर।
“ये मेरा घर – हमारा घर होगा”
कहा था तुमने थर्राकर।।
वैतर्णी के पार
है एक संसार।
मैं तो तर गया
है आपका क्या विचार?