Archive for the 'विश्वासघात' Category



अकेलेपन से खौफ आता है मुझको

Published on जुलाई 15, 2008

क्यों ये जीवन इतना उदासीन लगता है? सब नीरस। आज कार्यालय नहीं गया। न जाने जीवन आज क्या दिखाना चाहता है? पिछले वर्ष एक दिवस कार्यालय नहीं गया था तो जीवन कुछ क्षणों में उथल पुथल हो गया था। सम्बन्धों के मायने ही बदल गए। आज भी किसी अनहोनी का एहसास लिए बैठा हूँ। इसी [...]


I’ll stick to my dharma and do my karma

Published on नवम्बर 6, 2007

I’d been feeling low all this while. It was not about being sentimental. It was also about dharma and karma, I have talked about in one of my earlier posts.
I’ve taken a decision, and am probably at peace with myself after that. It depends how one takes it. Though it’s not vindictive as some might [...]


अलविदा

Published on नवम्बर 2, 2007

तुमने दलदल चुना। अब वहीं रहो। तुम्हे एक मौका दिया गया था पश्चाताप करने का, जो कि तुमने गँवा दिया है। अब ज़िदगी भर इस बोझ को अपने सीने पर ढ़ोते रहो। और इस दलदल में रहो। अलविदा।


स्वप्न

Published on अक्तुबर 30, 2007

मैं इन ढाई महीनों को अगर पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो पाता हूँ की तुम्हे छोड़ने से ज्यादा कारण हैं की हम इस सम्बन्ध की एक नए सीरे से शुरुआत करें।
कारण यही नहीं की मैंने तुम्हारे साथ एक अच्छा वक्त गुज़ारा है, या मेरे हृदय में तुम्हारे लिए अभी भी प्यार है। परन्तु यह [...]


नया सम्बन्ध

Published on

चाह हो रही है कि तुमसे बात करूँ, परन्तु कैसे करूँ? वैसे आश्चर्य नहीं हुआ कि तुम अब भी झूठ बोल रही हो। मैंने जैसा सोचा था कि झूठ बोलना आज तुम्हारी मजबूरी बन चुकी है। मैं तुम्हारे साथ एक नया जीवन शुरू करने के लिए तैयार हूँ, परन्तु पहले जैसी बात न होगी इस [...]


क्षमा

Published on अक्तुबर 27, 2007

इस रिश्ते के कितने मायने हैं, शायद तुम्हे भी एहसास न होगा। शायद मुझे भी एहसास न था। यह मैंने इन पिछले दो महीनों में जाना।
गोलू जो मेरी सबसे प्यारी है, फूट फूट कर रोने लगी जब उसे पता चला कि तुम अब मेरे साथ नहीं रह रही हो। कहने लगी: अब भइया का क्या [...]


क्यों कड़वी की तुमने स्मृतियां

Published on अक्तुबर 17, 2007

क्यों कड़वी की तुमने सब वो स्मृतियां जो हमारे अच्छे समय की थीं। मैं गाँव से वापिस आ रहा था। पापा ने जिद्द की कि हम खाना छैला से ऊपर खाएं। पर मेरा मन नहीं था। मैं कुछ न कह सका। पर मैं खाना नहीं खा पाया। मुझे सब याद आ रहा था जब तुम्हारा [...]


जाओ असत्य का जीवन जियो

Published on अक्तुबर 12, 2007

क्यों हुआ, कैसे हुआ, इन सब बातों में कुछ नहीं रखा है। विश्वासघात, विश्वासघात है। जो कि क्षमा योग्य नहीं है। क्या रखा है इन बातों में जब कि तुम सात फेरों कि मर्यादा लांघ चुकी हो।
क्या रस्में केवल रस्में थी या उनके कुछ मायने भी थे? मैंने कस्मे खाई थी, क्या तुमने नहीं खाई [...]